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Prateek Kuhad

"Kasoor"

[Verse 1]
हाँ, मैं गुमसुम हूँ इन राहों की तरह
तेरे ख्वाबों में, तेरी ख्वाहिशों में छुपा
ना जाने क्यों, है रोज़ का सिलसिला
तू रूह की है दास्तान

[Chorus]
तेरे ज़ुल्फ़ों की ये नमी
तेरी आँखों का ये नशा
यहाँ खो भी जाऊँ तो मैं
क्या कसूर है मेरा?


[Verse 2]
क्यों ये अफ़साने इन लम्हों में खो गए
हम घायल थे इन लफ़्ज़ों में खो गए
थे हम अनजाने, अब दिल में तुम हो छुपे
हम हैं सेहर की परछाइयाँ

[Chorus]
तेरे साँसों की रात है
तेरे होंठों की है सुबह
यहाँ खो भी जाऊँ तो मैं
क्या कसूर है मेरा?
क्या कसूर है मेरा?
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